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कर्मभूमि
Published1932
Pages410
LanguageHindi

कर्मभूमि

by मुंशी प्रेमचंद

About this Book

कर्मभूमि मुंशी प्रेमचंद द्वारा 1932 में रचित एक अत्यंत प्रभावशाली, बहुआयामी और राजनीतिक-सामाजिक चेतना संपन्न उपन्यास है। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में 1930 के दशक का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सविनय अवज्ञा आंदोलन और किसानों का लगान-बंदी संघर्ष है। कहानी का नायक अमरकांत एक संवेदनशील, आदर्शवादी नवयुवक है जो अपने धनी व्यापारी पिता के भौतिकवादी विचारों से विद्रोह करता है। वह सुख-सुविधाओं का त्याग कर ग्रामीण अंचलों में जाता है और गरीबों, अशिक्षितों और अछूतों के उत्थान के लिए समर्पित हो जाता है। उपन्यास में मंदिर-प्रवेश आंदोलन और दलितों के मानवीय अधिकारों के संघर्ष को अत्यंत मुखरता और यथार्थ के साथ उठाया गया है। अमरकांत की पत्नी सुखदा, जो पहले विलासिताप्रिय थी, आगे चलकर शहरी सत्याग्रह और महिलाओं के जन-आंदोलन का नेतृत्व संभालती है। सलीम, शांति कुमार और मुन्नी जैसे जीवंत पात्र अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के सामने सीना तानकर खड़े होते हैं और जेल जाते हैं। प्रेमचंद ने इसमें गांधीवादी अहिंसा, जन-जागृति और सामूहिक सत्याग्रह की असीम शक्ति का सजीव खाका खींचा है। उपन्यास स्पष्ट करता है कि सच्ची आजादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सामाजिक और आर्थिक न्याय पहुंचाना है। कर्म और त्याग की यह पावन गाथा प्रत्येक पाठक में राष्ट्रप्रेम, समानता और सामाजिक कर्तव्यबोध की भावना को प्रज्वलित करती है।