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प्रेमा
Published1907
Pages160
LanguageHindi

प्रेमा

by मुंशी प्रेमचंद

About this Book

प्रेमा उपन्यास मुंशी प्रेमचंद के प्रारंभिक रचनात्मक काल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मील का पत्थर माना जाने वाला उपन्यास है। इस रचना में प्रेमचंद ने पहली बार प्रेम, व्यक्तिगत निष्ठा और सामाजिक सुधार के अंतर्द्वंद्व को प्रमुखता से चित्रित किया। उपन्यास की कथा अमृतराय और प्रेमा के निश्छल, उदात्त और निष्कलंक प्रेम संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है। अमृतराय समाज में विधवाओं की पीड़ा देखकर आजीवन विधवा-विवाह को बढ़ावा देने का कठोर और साहसिक संकल्प लेते हैं। प्रेमा अपने असीम प्रेम और व्यक्तिगत सुख की आहुति देकर अमृतराय के इस महान सामाजिक संकल्प का पूर्ण समर्थन करती है। प्रेमचंद ने तत्कालीन संभ्रांत वर्ग के झूठे आडंबरों, संकीर्ण जातिवादी मान्यताओं और विवाह के बाजारीकरण पर करारी चोट की है। कथानक में मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुंदर और संतुलित ताना-बाना बुना गया है जो पाठक को भावविभोर कर देता है। यह उपन्यास दर्शाता है कि सच्चा प्रेम केवल मिलन में नहीं, बल्कि अपने प्रिय के उच्च आदर्शों के लिए सर्वस्व त्यागने में है। प्रेमचंद की भाषा इस उपन्यास में सरल, प्रभावोत्पादक और संवादों में नाटकीय सजीवता से परिपूर्ण है। यह कृति प्रेमचंद के महान कथाकार बनने की यात्रा का वह शुरुआती दस्तावेज है जिसमें उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता स्पष्ट झलकती है।

प्रेमा by मुंशी प्रेमचंद | Anchor Library