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सुखदास
Published1924
Pages150
LanguageHindi

सुखदास

by मुंशी प्रेमचंद

About this Book

सुखदास मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कथा-परंपरा की एक अत्यंत संवेदनशील, यथार्थवादी और विचारोत्तेजक रचना है। इस कृति में ग्रामीण भारत के जनजीवन, कृषक समाज की दुर्दशा और मानवीय रिश्तों के ताने-बाने को बहुत गहराई से उकेरा गया है। कहानी का मुख्य पात्र सुखदास अपनी सरलता, कर्तव्यनिष्ठा और अडिग सिद्धांतों के साथ जीवन के थपेड़ों का सामना करता है। ग्रामीण अंचल में जमींदारी शोषण, सूदखोरी के जाल और प्रशासनिक उदासीनता के बीच एक साधारण मनुष्य का संघर्ष इसमें साकार होता है। प्रेमचंद ने ग्रामीण समाज के सीधे-सादे लोगों के भीतर छिपी ईर्ष्या, प्रेम, त्याग और आपसी कलह का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। सुखदास का चरित्र विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी ईमानदारी और मानवीय गरिमा को नहीं खोता। यह रचना यह स्पष्ट करती है कि गरीबी और अभाव मनुष्य के तन को तो तोड़ सकते हैं, किंतु उसकी अंतरात्मा को नहीं डिगा सकते। प्रेमचंद की लोकोक्तियों, मुहावरों और लोक-संस्कृति से सजी भाषा शैली इस उपन्यास को असाधारण जीवंतता प्रदान करती है। गाँव की चौपालों, खेतों की मेड़ों और अभावग्रस्त झोपड़ियों का जो दृश्य यहाँ खिंचा है, वह पाठक के दिल को सीधे छू जाता है। नैतिकता और आत्मसम्मान से जीने का संदेश देने वाली यह कृति प्रेमचंद के संपूर्ण साहित्य का एक अनमोल मोती है।

सुखदास by मुंशी प्रेमचंद | Anchor Library