
नये पत्ते
by सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
About this Book
नये पत्ते महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के उत्तरार्ध का एक अत्यंत क्रांतिकारी, तीखा और व्यंग्यात्मक कविता-संग्रह है। इस संग्रह की कविताओं में निराला जी छायावादी रोमानियत के आवरण को पूरी तरह उतारकर सीधे आम जनता की जमीन पर खड़े होते हैं। इसमें संकलित प्रसिद्ध व्यंग्य कविता 'कुकरमुत्ता' पूंजीवादी अभिजात्य वर्ग और शोषित सर्वहारा वर्ग के द्वंद्व की कालजयी रचना है। गुलाब जहाँ विलासिता, विदेशी संस्कृति और शोषक वर्ग का प्रतीक है, वहीं कुकुरमुत्ता अपनी आत्मनिर्भरता और जनशक्ति का उद्घोष करता है। निराला जी ने तत्कालीन राजनीतिक नेताओं के पाखंड, साहित्य जगत के मठाधीशों और आर्थिक विषमता पर बेखौफ प्रहार किए हैं। उनकी भाषा में ठेठ गंवई मिठास, उर्दू के रोजमर्रा के शब्द और नुकीले मुहावरे एक अनोखी मारक क्षमता पैदा करते हैं। संग्रह की रचनाएँ आम रिक्शेवाले, मजदूर, किसान और फुटपाथ पर रहने वाले दीन-दुखियों के जीवन की सच्चाई बयां करती हैं। निराला ने पारंपरिक छंद-विधान को तोड़कर आधुनिक मुक्त छंद और व्यंग्य कविता को एक नई सशक्त अभिव्यक्ति दी। यह पुस्तक दिखाती है कि कैसे एक महान कवि अपने व्यक्तिगत दुखों को भूलकर समाज के वंचितों की सबसे बुलंद आवाज बन जाता है। 'नये पत्ते' हिंदी साहित्य में प्रगतिशील चेतना, निर्भीक अभिव्यक्ति और जन-पक्षधरता का एक बेजोड़ और अमर दस्तावेज है।