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नील कुसुम
Published1954
Pages130
LanguageHindi

नील कुसुम

by रामधारी सिंह ‘दिनकर’

About this Book

नील कुसुम राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का एक अत्यंत विशिष्ट, अनूठा और नवीन भाव-बोध से संपन्न काव्य-संग्रह है। दिनकर जी को आमतौर पर 'हुंकार' और 'कुरुक्षेत्र' के ओज, पौरुष और क्रांतिकारी तेवर के कवि के रूप में जाना जाता है। किंतु 'नील कुसुम' में पाठक को दिनकर का एक नितांत भिन्न रूप दिखाई देता है, जहाँ उनकी वाणी में कोमलता और प्रयोगशीलता है। यहाँ कवि युद्ध और राजनीति के कोलाहल से दूर होकर मानव-मन के अंतर्द्वंद्व, सौंदर्य, प्रेम और कलात्मक जिज्ञासा में डूबता है। नीले कुसुम का प्रतीक आत्मा की शांति, गहन चिंतन और जीवन के सूक्ष्म रहस्यों की खोज का द्योतक है। दिनकर ने इन कविताओं में आधुनिक जीवन की विद्रूपताओं, मशीनी युग के खोखलेपन और आधुनिकता की चुनौतियों पर गंभीर विचार व्यक्त किए हैं। उनकी भाषा में ओज का प्रवाह बरकरार रहते हुए भी एक दार्शनिक गंभीरता और बिंबों की नवीनता स्पष्ट परिलक्षित होती है। यह संग्रह दिनकर जी की उस संक्रमणकालीन काव्य-चेतना को दर्शाता है जो आगे चलकर 'उर्वशी' जैसे अमर महाकाव्य में फलीभूत हुई। कविताएँ पाठक को केवल उत्तेजित नहीं करतीं, बल्कि उसे ठहरकर अपने समय और अस्तित्व पर चिंतन करने की प्रेरणा देती हैं। दिनकर के काव्य के बहुआयामी स्वरूप को समझने के लिए 'नील कुसुम' हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए एक अनिवार्य अध्ययन है।

नील कुसुम by रामधारी सिंह ‘दिनकर’ | Anchor Library