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विराम-चिह्न
Published1957
Pages170
LanguageHindi

विराम-चिह्न

by रामधारी सिंह ‘दिनकर’

About this Book

विराम-चिह्न राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित एक अत्यंत विचारोत्तेजक, गंभीर और विद्वत्तापूर्ण निबंध-संग्रह है। दिनकर जी जितने समर्थ और ओजस्वी महाकवि थे, गद्य लेखन और वैचारिक चिंतन में भी उनका स्थान उतना ही सर्वोच्च और अप्रतिम था। इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता, साहित्य के शाश्वत प्रयोजन और बदलते समाज पर उनके मौलिक विचार संकलित हैं। 'विराम-चिह्न' नाम इस बात का प्रतीक है कि जीवन और राष्ट्र की तीव्र भागदौड़ में रुककर आत्ममंथन और दिशा-निर्धारण करना कितना आवश्यक है। दिनकर ने इसमें पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए भारत की सनातन आध्यात्मिक शक्ति को रेखांकित किया है। लेखक ने आधुनिक भारत के सामने उपस्थित सांस्कृतिक संकट, भाषा विवाद और शिक्षा प्रणाली की कमियों पर अत्यंत निर्भीकता से लिखा है। दिनकर का गद्य अत्यंत प्रखर, तर्कसंगत, ओजपूर्ण और सहज बोधगम्य है, जो पाठक की विचार-शक्ति को नई धार देता है। यह निबंध-संग्रह दिनकर की प्रसिद्ध कृति 'संस्कृति के चार अध्याय' के वैचारिक विस्तार और उसकी पीठिका की तरह काम करता है। प्रत्येक निबंध पाठक को अपने इतिहास, परंपरा और भावी राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के प्रति सजग और विचारशील बनाता है। हिंदी के वैचारिक और सांस्कृतिक गद्य-साहित्य में यह पुस्तक एक मील का पत्थर है जो हर प्रबुद्ध नागरिक के लिए पठनीय है।